कश्मीर की क़यामत

[१५ अगस्त, १९४७| झेलम नदी के किनारे पर| शाम का समय, आस-पास एकदम सन्नाटा है| स्टेज पर अँधेरा है, सिर्फ एक गाने की आवाज़ कहीं दूर से आ रही है| “झेलम” गाना बजने लगता है| जैसे-जैसे गाने की आवाज़ बढ़ती है, स्टेज पर लाइट आने लगती है| एक कुर्सी नज़र आती है, और उस पर एक लड़की बैठी है| कुछ १८ या १९ साल की, उसने अपनी स्कूल यूनिफार्म पहनी हुई है| वो एक किताब पढ़ रही है और उसका ध्यान सिर्फ किताब के पन्नों पर है| जैसे उस पर लाइट आती है, वो किताब से ऊपर देखती है|] 

मैं उनसे अक्सर पूछा करती थी, वही सवाल जिसका जवाब मुझे हमेशा पता होता था| यह सोचते हुए कि एक-न- एक दिन उनका जवाब शायद अलग हो, सच हो| हाँ, तुम्हें क्या लगा, मैं उनके झूठ को ऐसे ही मान लेती? (हस्ते हुए) मैं बच्ची थोड़ी रही अब, हम सब बड़े हो गए| हमें बड़ा होना पड़ा| इस मुल्क को भला और कौन बचा सकता है? मैं नहीं, तुम नहीं… अच्छा, तो मैं कहाँ थी? हाँ, वो सवाल जिसका जवाब वो देने से मना कर देते थे| थी मैं बच्ची तब, भोली सी, मासूम सी| उन्हें तो यही लगता था, उनकी ज़ोया जो सिर्फ सवाल करने में माहिर थी| वे यह नहीं जानते थे की उनकी बेटी और बहुत कुछ कर सकती थी| अगर कोई उसे इन सवालों के सही जवाब देने से इंकार करता, वो खुद उन जवाबों की खोज में लग जाती| कहीं भी जाती, किसी भी हद तक जाने को तैयार थी, उन सवालों के जवाबों को ढूंढ़ने, पहचानने, खोद निकालने, उनका सामना करने| उनकी औलाद थी ही ऐसी, उसे कोई १७ साल में रोक नहीं सका| आज उसे रोकने की हिम्मत भला किस्में थी?

[झेलम, झेलम ढूंढे किनारा

झेलम, झेलम ढूंढे किनारा

 

झेलम, झेलम ढूंढे किनारा

झेलम, झेलम ढूंढे किनारा]

पहली बार मैंने अम्मी से यह सवाल किया था| “अम्मी, मेरे नाम का क्या मतलब है? मुझे आप ज़ोया नाम से क्यों पुकारती हैं?” अम्मी ने जैसे मुझे अनसुना कर दिया| तब तक उन्होंने मुझे अनदेखा तो कर दिया था, न जाने किस वजह से| शायद, शायद, यह अच्छी बात है कि मुझसे कुछ बातें छुपी रहीं| अब तक मुझसे राज़ रखे गए| क्योंकि मैं उनकी सारी बातों को छुप-छुपके सुना करती थी| तुम्हें क्या लगा, मैं रात को अफ़ज़ल और फैज़ान की तरह बल्ब के भुझते ही सो जाया करती थी? कि मैं नींद के मोह में अपने आप को गवा देती थी? (ठहराव) अब्बू को शक हुआ करता था, वो मुझे बड़े ही गौर से देखा करते थे| सुबह नाश्ता करते वक्त, शाम को रेडियो पर खबर सुनते हुए और कभी कभी, मेरे सपनों में वे मेरे एकदम करीब होते थे, मेरी हर सांस की परीक्षा लेते हुए|

[डूबा सूरज, किन आँखों में

सूरज डूबा, किन आँखों में

झेलम हुआ खारा

 

झेलम, झेलम ढूंढे किनारा

झेलम, झेलम ढूंढे किनारा]

कई रात, मैं दरवाज़े के उस झरोखे से उनकी बातें सुना करती थी| कुछ लम्हें हुआ करते थे, जब मैं सांस पकड़ते हुए अम्मी की धीमी आवाज़ सुना करती थी| वो रोती थी, बहुत रोती थी| उन दिनों, जब हमें हर रोज़ मुल्क के लोगों से अभिवादन से ज़्यादा गालियाँ सुनने की आदत पड़ गई थी, जब फैज़ान मुझसे पूछता था कि क्या आज भी ललित— जो एक ज़माने में उसका सबसे अच्छा दोस्त हुआ करता था, अपने दोस्तों के साथ मिलकर हमारे घर की ओर पत्थर फेकने में लग जाएगा|  और अफ़ज़ल, अफ़ज़ल बिलकुल अम्मी पर गया था| हर रात, अपने तकिए को कहानियाँ बताते हुए वो भी तो रोता था| सब हिल गए थे, और सबसे दिलचस्प बात तो यह है: सबको यह लगता था कि हम एक दूसरे को इस सब से छुपा रहे थे, अभय थे, सुरक्षित रख रहे थे|

 

हम सब अंदर ही अंदर एक युद्ध लड़ रहे थे, अपने आप से और अपने लिए|

(म्यूजिक सुनाई देता है, ज़ोया अपनी किताब की ओर मुड़ जाती है और उससे पढ़ते हुए)

“अब्बू, एक सवाल पूछूं आपसे? आप सच-सच जवाब देंगे?”

“अभी नहीं, ज़ोया| रेडियो पर नेहरू जी कश्मीर के बारे में कुछ समाचार लेकर आए हैं| मुझे गौर से सुनने दो, हमें शायद ही दो-तीन दिनों में इस घर को छोड़कर कहीं दूर जाना होगा| जाओ, अम्मी को तुम्हारी मदद की सख्त ज़रूरत है इस वक्त| जाओ!”

झूठ| झूठ पर झूठ, अब्बू| दो दिन, तीन दिन, दस दिन, एक महीना, दो साल, सात साल| हम घर से दूर हैं, बहुत दूर, मगर आप? आप यहीं बसे हैं, इस सब के बावजूद| अब्बू, उन्होंने आप को ज़लील किया| आप क्यों नहीं समझते की आप घायल हैं? आपके ज़ख्म का मरहम हमेशा आपके सामने, आपके आस-पास हुआ करता था| और आपने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया, देखते हुए भी अनदेखा कर दिया| आपके सारे घावों को मैं ठीक कर सकती थी, अब्बू| इसी बात को साबित करने तो मैं यह सब कुछ कर बैठी|

मैं कश्मीर के गाँवों का इलाज करना चाहती हूँ| अपने आस-पास की आग को भुझाने, मैंने अपने आप को आग पर लगा दिया| सब कुछ जल रहा है, अब्बू, सब कुछ नष्ट हो रहा है| वो घर, वो यादें, हमारा परिवार, अम्मी| और आप| आप भी, अब्बू|

 

मुझे बचाने की कोशिश क्यूँ कर रहे हैं आप?

 

मैं और नहीं सह सकी, आपका विनाश मुझसे देखा नहीं गया| इसीलिए, मैं अपने आप को त्याग कर रही हूँ| आपके लिए, हमारे लिए, इस देश के भविष्य के लिए|

(वो कुर्सी से अब उठ गई है, किताब को गिरा देती है| अपने कलाइयों को सामने करते हुए)

यह सपना नहीं है, अब्बू| क्या आपको नज़र आ रहा है, इस आग की लपटों ने मुझे निगल लिया है, मेरा कुछ नहीं बचा| इस सब के अंत में, मेरा कुछ नहीं बचेगा| मेरे इस शरीर के जगह सिर्फ राख रह जाएगा|

[लहू बहता अंगारा, लहू बहता अंगारा

डूबा सूरज, किन आँखों में

सूरज डूबा, किन आँखों में

 

झेलम हुआ खारा]

अम्मी, अब्बू, आप ही तो कहते थे कि मेरे नाम का सिर्फ एक मतलब है: वो जो हमेशा ज़िंदा रहेगी| इसी झूठ को सामने लाने, आपको बचाने के लिए, मैंने अपने आप को त्याग दिया| इस मुल्क के लिए, आपके और मेरे कश्मीर के लिए, ज़ोया को मरना पड़ा|

 

अब कश्मीर की आग मेरे अंदर जलती रहेगी|

उसे भुझाने की कोशिश कौन करेगा?

 

[ब्लैक आउट]

 

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